Class 11 Hindi (Antra) term-II सारांश : पाठ 15 – जाग तुझको दूर जाना

NCERT Solutions for Class 11 (Antra) term-II Summary : Chapter- 15 jaag tughko duur jana

लेखिका

– महादेवी वर्मा

प्रस्तुत गीत ‘महादेवी वर्मा’ के प्रसिद्ध रचना ‘संध्यागीत’ से लिया गया है। यह गीत स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरणा से लिखा गया जागरण गीत है। मतलब किसी को जागृत करना। इसमें कवित्री ने भीषण कठिनाइयों की चिंता ना करते हुए कोमल बंधनों के आकर्षणों से मुक्त होकर अपने लक्ष्य को निरंतर करते रहने का आवान किया है।

कवित्री निरंतर सजक रहने वाले और आलस्य में पड़े देशवासियों के लगातार आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, कि वे लोग अब आलस में ना रहे और आगे बढ़े। ‘महादेवी वर्मा’ जी उन्हें समझाती हैं , कि मार्ग में अनेक प्रकार की प्राकृतिक बाधाएं होंगी। बहुत सारे आकर्षण होंगे पर तुझे इस नाश के पद पर अपने चरण चिन्ह अंकित करके आगे बढ़ते चले जाना है। पर्वत काप सकते हैं, आकाश प्रलय ला सकता है, पृथ्वी पर घनघोर अंधकार छा सकता है, तूफान घिर सकता है,  पर तुझे किसी से भयभीत नहीं होना है।

आकाश , पाताल , पर्वत , पृथ्वी सब तेरे रास्ते में आगे बढ़ने की तरक्की में रोड़े अटकाएंगे लेकिन तुझे उनसे डरना नहीं है। इन सभी विभिन्न बाधाओं के अतिरिक्त सांसारिक मोह के आकर्षण भी तेरे रास्ते में बहुत सारी बाधाएं पैदा करेंगे। प्रेम का बंधन भी तेरे बढ़ते कदमों को पीछे खींच सकता है। लेकिन तुझे कभी भी इन रूप और जितने भी आकर्षण हैं उन में नहीं उलझना है। और बिल्कुल भी रुक कर पुनः आराम नहीं करना है।

‘महादेवी वर्मा’ जी कहती हैं कि कितने भी तेरे अंदर सुख , दुख में विलास के लिए इच्छा होगी , लेकिन तुझे वहां पर भी कोई उनमें दिलचस्पी नहीं दिखानी है। तू जीवन सुधार के बदले दो घूंट मदिरा का सौदा कर सकता है। कवित्री ने आत्मा की अमरता का ज्ञान करते हुए मृत्यु से ना डरने की सलाह दी है। यदि तुम्हारे ह्रदय में दर्द होगा तभी तुम्हारी आंखों में आंसू आएंगे , क्योंकि मन में जितना उत्साह और दृढ़ता होगी , उतनी ही आंखों में स्वाभिमान की भावना आएगी। तेरा सम्मान हारने पर भी बना रहेगा। यह जीवन की लौ में जलकर अपने को जीता हुआ मानता है। तुझे तो विपरीत परिस्थितियों में भी मन की कोमल भावनाओं को छोड़कर तुम्हें देश प्रेम की मिसाल बनाना है , तू जाग जा तुझे अभी दूर जाना है।

तुम निरंतर जागरूक रहते हो , लेकिन आज तुम्हारी आंख निंद्रा से भरी क्यों है? आज तेरी वेशभूषा इतनी अस्तव्यस्त क्यों है? तेरा लक्ष्य बहुत दूर है और मार्ग भी तेरा लंबा है पर तुझे जाना है।

फिर ‘महादेवी वर्मा’ जी कहती हैं कि आकाश , पाताल , धरती विपदाए आए चाहे बिजली कड़के या बादल गरजे और कितने भी आंधी , तूफान आए लेकिन तुझे घबराना नहीं है।

इस नाश के पद पर अपना अमर बलिदान देकर अपने अमिट निशान छोड़ने होगे।   

 सब आंखों के आंसू उजले

‘महादेवी वर्मा’ इस गीत में कहती हैं कि लोगों की आंखों में जो आंसू होते हैं उनमें सच्चाई होती है , उनके सपने खाली नहीं होते हैं।

उनके सपने सत्य की कल्पना से भरे होते है , जिनमें उत्साह होता है। जैसे कि दीपक जलकर रोशनी तथा फूल से खुशबू फैलाता है। इनका एक सच यह भी है , कि दीपक खिल नहीं सकता और फूल कभी जल नहीं सकता।

दोनों के अपने-अपने सत्य हैं। अथार्थ सभी इंसानों की प्रकृति अलग-अलग होती है।

पर्वत अपने आप से सैकड़ों झरनो में बहकर धरती से मिलता है। यही पर्वत धरती को घेरकर एक गोला सा बना लेता है। भले ही यह पर्वत बाहर से कितना भी कठोर हो लेकिन इसके अंदर निर्मल धारा बहती रहती है। अथार्थ जिन लोगों का व्यवहार बाहर से कठोर हो लेकिन वह भी अंदर से नरम होते हैं। यह एक सत्य है।

अतः व्यक्तित्व का अंदाजा बाहरी रूप से नहीं लगाया जा सकता। ‘महादेवी वर्मा’ कहती है , कि यह संसार दुखों में जलता है तो कभी फूल की तरह खिलता है। प्रत्येक व्यक्ति के सपने में कुछ ना कुछ सच्चाई जरूर छिपी रहती है।

शब्दार्थ:

1. चिर- सदा रहने वाला
2. सजग- सचेत ,सावधान
3. व्यस्त बाना- बिखरा या अस्त व्यस्त वेश
4. अचल- पर्वत, पहाड़
5. हिमगिरी- बर्फ का पर्वत
6. प्रलय- तूफान, सर्वनाश
7. मौन- चुप
8. अलसित- आलसी
9. व्योम- आकाश
10. आलोक- रोशनी ,प्रकाश
11. तिमिर- अंधकार
12. निष्ठुर- कठोर
13. चिन्ह- निशान
14. मोम के बंधन- नष्ट होने वाला बंधन
15. तितलियां- युवतियां
16. क्रंदन- विलाप
17. मधुप- भंवरा
18. कारा- बंधन
19. वज्र- कठोर, पत्थर
20. उर- ह्रदय
21. अश्रु-कण- आंसू
22. सुधा- अमृत
23. मदिरा- शराब
24. मलय की बात- चंदन की सुगंधित वायु
25. उपधान- सहारा
26. सुत- बेटा
27. दृग- नेत्र
28. मानिनी- सम्मानित करने वाला
29. अंगार-शय्या- अंगारों की सेज
30. मृदुल- कोमल
31. सत्य- सच्चाई
32. मकरंद- फूलों का रस
33. आलोक- प्रकाश
34. सौरभ- सुगंध
35. संगी- साथी
36. अचल- पर्वत
37. निर्झर- झरना
38. परिधि- गोल घेरा
39. उर्मिल- पवित्र
40. गिरी- पर्वत
41. नभ- आकाश
42. पुलकित- प्रसन्नाचित्त
43. मधु- शहद
44. कंचन- सोना
45. हीरक- हीरा
46. मरकत- पन्ना
47. संपुट- दल
48. आभा- चमक
49. स्पंदन- धड़कन
50. रज- रेत
51. अंकुर- बीज
52. संसृति- संसार
53. पद- कदम
54. अंकन- चिन्ह
55. एकाकी- अकेला
56. पाषाण- पत्थर
57. नाश- खत्म
58. पथ- रास्ता

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