अलंकार और उसके भेद हिंदी ग्रामर

Alankar aur uske bhed in hindi grammar

अलंकार की परिभाषा:– अलंकार का अर्थ होता है– आभूषण। जिस प्रकार से स्त्री अगर आभूषण को पहन कर घर से बाहर निकलती है तो सभी लोग उसी की ओर देखते हैं, तथा अपने मन में कुछ ना कुछ ख्याल लाते हैं। क्योंकि स्त्री की शोभा आभूषण से ही होती है, ठीक उसी प्रकार काव्य की शोभा अलंकार से होती है।

अलंकार का शाब्दिक अर्थ यह है कि जो किसी वस्तु को अपनी और आकर्षित करे, वह अलंकार कहलाता है। अलंकार की परिभाषा को एक और रूप में लिख सकते हैं, जिस प्रकार स्त्री के आभूषण पहनने से उसकी शोभा बढ़ती है, ठीक उसी प्रकार काव्य की शोभा भी अलंकार से ही बढ़ती है।

जिस वाक्य से काव्य की सुंदरता बढ़ जाए उसे अलंकार कहते हैं।

अलंकार के कितने भेद होते हैं?

अलंकार के पूर्ण रूप से आठ भेद होते हैं।

१. अनुप्रास अलंकार

२. यमक अलंकार

३. श्लेष अलंकार 

४. उपमा अलंकार

५. उत्प्रेक्षा अलंकार

६. रूपक अलंकार

७. मानवीकरण अलंकार

८. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।

अलंकार के मुख्य रूप से दो भेद होते हैं।

१. शब्दालंकार

२. अर्थालंकार

१. शब्दालंकार की परिभाषा:– शब्दालंकार वह अलंकार होते हैं, जो अलंकार शब्दों के माध्यम से काव्य की सुंदरता को बढ़ाए अर्थात अपनी और आकर्षित करे। यानी किसी भी एक वाक्य के उपयोग से सौंदर्य आए और अगर वाक्य में पर्यायवाची शब्द आ जाने से लुप्त हो जाए, तो वह शब्दालंकार कहलाते हैं।

शब्दालंकार के अंदर मुख्य रूप से तीन भेद होते हैं:– 

१. अनुप्रास अलंकार

२. यमक अलंकार

३. श्लेष अलंकार 

१. अनुप्रास अलंकार की परिभाषा:– जिस अलंकार में एक ही वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो उसे अनुप्रास अलंकार कहते हैं। जब किसी काव्य को सुंदर बनाने के लिए किसी वर्ण की बार-बार आवृत्ति हो, किसी विशेष वर्ग की आवृत्ति से वाक्य सुनने में सुंदर लगता है, अनुप्रास अलंकार कहलाता है। इस अलंकार में ऐसा नहीं है कि वह एक ही वर्ण हो, जितने भी अ से ज्ञ तक वर्ण होते हैं, इनमें से किसी भी वर्ण  की आवर्ती हो सकती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ और सिर्फ क या ख वर्ण ही आए। अ से ज्ञ तक के सभी वर्ण हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए:– 

१. कालिंदी कूल कंदब की डारिन।

इस वाक्य में   ‘ क ’ वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो रही है, क वर्ण की आवर्ती से वाक्य की शोभा बढ़ रही है। कालिंदी कूल कंदब की डारिन वाक्य सुनकर बहुत ही अच्छा लग रहा है। जैसा अनुप्रास अलंकार की परिभाषा में बताया गया है कि जिस वाक्य में एक ही वर्ड की आवृत्ति बार-बार हो, वहां पर अनुप्रास अलंकार होगा। इसलिए जहां पर भी एक ही वर्ण  बार-बार उपयोग हो, वहां पर अनुप्रास अलंकार ही होगा।

२. धवल चांदनी बिछी हुई है, अवनि और अंबर तल में।

इस वाक्य में  ‘ अ ’ वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो रही है, इसमें आप यह भी सोच रहे होंगे कि च, ब, ह, क्यों नहीं है। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा अ वर्ण की आवृत्ति हो रही है। अवनी और अंबर यह वाक्य तीन बार उपयोग हुए हैं, और बाकी सभी वाक्य एक बार ही उपयोग हुआ है। इसलिए यह अनुप्रास अलंकार है।

३. रघुपति राघव राजा राम।

ऊपर दिए गए उदाहरण में ‘ र ’ वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो रही है। इस उदाहरण में भी एक ही वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो रही है, इसलिए यह अनुप्रास अलंकार है। यह वाक्य सुनने में बहुत अच्छा लग रहा है, रघुपति राघव राजा राम। इस वाक्य को पढ़कर भक्ति प्रकट हो रही है।

४. तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।

इस वाक्य में ‘ त ’ वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो रही है। इस वर्ण से वाक्य की शोभा बढ़ रही है। यह  उदाहरण अनुप्रास अलंकार है। क्योंकि इसमें भी एक ही वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो रही है।

२. यमक अलंकार की परिभाषा:– जिस प्रकार से अनुप्रास अलंकार में एक ही वर्ण की आवृत्ति बार-बार होती है तो वह अनुप्रास अलंकार कहलाता था। ठीक उसी तरह यमक अलंकार में भी किसी काव्य की सौंदर्यता बढ़ाने के लिए एक शब्द की आवृत्ति बार-बार हो, वह यमक अलंकार कहलाता है। जब एक ही कविता में एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और उसका अर्थ अलग हो, तो वह यमक अलंकार होगा। ऐसा नहीं है कि एक ही शब्द दो बार प्रयोग हो रहे हैं तो उनका अर्थ भी एक जैसा होगा। ऐसा नहीं है, दोनों शब्दों का अर्थ अलग-अलग होगा। जैसे उदाहरण के लिए:– 

१. काली घटा का घमंड घटा।

इसमें एक घटा का अर्थ है बादल और दूसरे घटा का अर्थ कम होना है। इस वाक्य में एक ही शब्द दो बार आए हैं, परंतु इनका अर्थ भिन्न – भिन्न है। अतः इस वाक्य में यमक अलंकार है।

२. रति– रति शोभा सब रति के शरीर की।

इस वाक्य में एक रति का अर्थ है जरा सा और दूसरे रति का अर्थ है प्रेम। इसमें एक ही शब्द दो बार प्रयोग हुआ है, जिसमें दोनों शब्दों का अर्थ अलग-अलग है। अतः यह भी यमक अलंकार है।

३. कहै कबीर बेनी बेनी  ब्याल की चुराई लीनी।

इसमें एक ही शब्द दो बार प्रयोग हुआ है, जो है बेनी बेनी। जिसमें पहले बेनी का अर्थ है नाम जो शब्द कवि की ओर संकेत कर रहा है। दूसरे बेनी का अर्थ है चोटी। जो दूसरा बेनी है, वह चोटी की ओर संकेत कर रहा है।

३. श्लेष अलंकार की परिभाषा:– श्लेष अलंकार में अनुप्रास अलंकार और यमक अलंकार दोनों की परिभाषा से श्लेष अलंकार की परिभाषा अलग है। जिस कविता में एक शब्द एक ही बार प्रयोग किया जाए, उसे हम श्लेष अलंकार कहते हैं। लेकिन उस शब्द का अर्थ अलग – अलग हो। इसमें एक ही शब्द के भिन्न –  भिन्न अर्थ होते हैं। जैसे उदाहरण के लिए:–

१. सीधी चलते राह जो, रहते सदा निशंक।

     जो करते विप्लव,उन्हें ‘हरि ’ का है आतंक।।

ऊपर दिए गए श्लेष अलंकार के उदाहरण में हरि शब्द का एक ही बार प्रयोग हुआ है, लेकिन इस हरि का अर्थ दो निकलता है। पहला अर्थ है बंदर और दूसरा अर्थ है भगवान। इस वाक्य को देख कर ही पता चल रहा है कि इसमें गहराई से देखने वाला शब्द हरि है। क्योंकि इसके दोनों तरफ कोमा का उपयोग किया गया है। इसलिए इस वाक्य में और किसी भी शब्द पर ज्यादा ध्यान नहीं देना है, अधिक गहराई से देखने वाला शब्द हरि है। जिसका दो अर्थ निकाल रहा है बंदर और भगवान।

यह दोहा बंदर के लिए भी हो सकता है, तथा भगवान के लिए भी हो सकता है। इस दोहे में एक शब्द के दो अर्थ निकल रहे हैं, इसलिए यह श्लेष अलंकार है।

२. जे रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय ।   बारे उजियारो करै, बढ़े अंघेरो होय।

इस उदाहरण को भी देख कर पता चल रहा है कि यह उदाहरण श्लेष अलंकार का है। इस उदाहरण में रहीम जी इस दोहे के द्वारा दीये एवं कुपुत्र के चरित्र को एक जैसा दर्शाने की कोशिश की है। रहीम जी कहते हैं कि शुरू में तो यह दोनों ही उजाला करते हैं, लेकिन जब यह बढ़ते हैं तो अंधेरा हो जाता है।

दीपक और कुपुत्र यह दोनों शब्द के अलग-अलग अर्थ निकल रहे हैं। दीपक का अर्थ है बुझ जाना, दीपक के बुझ जाने से अंधेरा हो जाता है। कुपुत्र के बढ़ने के कहने का तात्पर्य है बड़ा हो जाना।

बड़े होने पर कुपुत्र कुकर्म करते हैं जिससे परिवार में अंधेरा छा जाता है और क्लेश जैसी दुविधा उत्पन्न होती है। इस दोहे में भी दोनों शब्दों के अलग-अलग अर्थ निकाल रहे हैं, अतः यह दोहा भी श्लेष अलंकार के भीतर आएगा।

३. मधुबन की छाती को देखो,

    इसकी कितनी कलियां।

२. अर्थालंकार

अर्थालंकार की परिभाषा:– अर्थालंकार का अर्थ है जब किसी भी वाक्य का सौंदर्य वाक्य के अर्थ पर आधारित होता है, तब वह अर्थालंकार कहलाता है।

अर्थालंकार के कितने भेद होते हैं?

अर्थालंकार के मुख्यत: पांच भेद होते हैं:– 

१. उपमा अलंकार

२. रूपक अलंकार

३. उत्प्रेक्षा अलंकार

४. अतिशयोक्ति अलंकार

५. मानवीकरण अलंकार।

उपमा अलंकार की परिभाषा:– जिस अलंकार में दो प्राणी,दो वस्तु की तुलना एक– दूसरे से की जाए, उसे उपमा अलंकार कहते हैं। उप का अर्थ होता है समीप से, तथा पा का अर्थ होता है तोलना या देखना। जब दो वस्तुओं में आपस में समानता दिखाई जाती है, तब वहां पर उपमा अलंकार होता है।

जैसे उदाहरण के लिए:–

१. चांद सा सुंदर मुख।

इस उदाहरण में चेहरे को चांद के समान बताया गया है। इसमें चेहरे की तुलना चांद से की गई है। इस वाक्य में

‘मुख’ – उपमेय है, ‘चन्द्रमा’ – उपमान है, ‘सुन्दर’ – साधारण धर्म  है एवं ‘सा’ – वाचक शब्द है। जैसा कि आपको पता है उपमा अलंकार में जब दो वस्तुओं की तुलना की जा रही है वहां पर उपमा अलंकार होगा।

अतः यह उदाहरण उपमा अलंकार के अंदर आएगा।

२. पीपल पात सरिस मन डोला।

उदाहरण उपमा अलंकार के अंदर आएगा।

२. पीपल पात सरिस मन डोला।

इस उदाहरण में पीपल के पत्ते को हिलता हुआ बताया गया है। पीपल पात सरिस मन डोला अर्थात पीपल के पत्ते को मन के तरह मिलता-जुलता बताया गया है।इस उदाहरण में ‘मन’ – उपमेय है, ‘पीपर पात’ – उपमान है, ‘डोला’ – साधारण धर्म है एवं ‘सरिस’ अर्थात ‘के सामान’ – वाचक शब्द है। जैसा की हम जानते हैं जब किसी दो वस्तु की तुलना आपस में की जाती है तो वहां उपमा अलंकार होता है। वैसे ही इस उदाहरण में पीपल के पत्ते की तुलना मन से की गई है। इसलिए यह उपमा अलंकार होगा।

उपमा अलंकार के अंग:–

उपमेय :– किसी भी वस्तु की समानता किसी अन्य पदार्थ के द्वारा दिखाया जाए तो वह उपमेय होता है।

जैसे:– कर कमल सा कोमल है। इस उदाहरण में कर उपमेय है।

उपमान:– उपमेय को जिसके समान बताया जाता है वह उपमान होता है। जैसे अगर किसी वाक्य को उपमेय के समान बताया जा रहा है तो वह उपमान होगा।

ऊपर जो उदाहरण हैं इसमें ‘कमल ’ उपमान है।

२. रूपक अलंकार की परिभाषा:– जिस अलंकार में वाचक शब्द नहीं होते और जहां किसी भी चीज के गुण की अत्यंत समानता के साथ आरोप किया जाता है, वह रूपक अलंकार कहलाते हैं। जब उपमान और उपमेय में भेद दिखाए जाते हैं तो वहां रूपक अलंकार होता है।

जैसे उदाहरण के लिए:– 

१. “मैया मैं तो चन्द्र-खिलौना लैहों”

उपयुक्त उदाहरण में चांद एवं खिलौनों में समानता नहीं दिखाई गई है तथा चांद को ही खिलौना बोल दिया गया है। अगर कोई बच्चा चांद का खिलौना लाने को कहे, तो यह संभव नहीं है। अतः यह उदाहरण रूपक अलंकार के अंतर्गत आएगा।

२. चरण-कमल बंदौं हरिराई।

इस उदाहरण में चरण को कमल के समान बताया गया है। इसमें चरणों को कमल के समान न दिखाकर चरण को ही कमल बोला गया है। उपयुक्त उदाहरण रूपक अलंकार के हैं।

३. उत्प्रेक्षा अलंकार की परिभाषा:– जिस अलंकार में रूप, गुण आदि समानता के कारण कल्पना की जाए, वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। इस अलंकार में वाचक शब्द होते हैं। ज्यों, त्यों, जानु, मानु, जानों आते हो तो ये वाचक शब्द होंगे। जहां पर उपमेय में उपमान की होने की संभावना का वर्णन हो, वहां पर उत्प्रेक्षा अलंकार होगा।

जैसे उदाहरण के लिए:– 

१. नेत्र मानो कमल हैं।

ऊपर दिए गए उदाहरण में ‘नेत्र’ – उपमेय की ‘कमल’ – उपमान होने कि कल्पना कि जा रही है।

मानो शब्द का प्रयोग कल्पना करने के लिए किया गया है। अतः यह उदाहरण उत्प्रेक्षा अलंकार के हैं।

२. मुख मानो चंद्रमा है।

इस उदाहरण में मुख के चंद्रमा होने की संभावना की जा रही है। इसमें मुख चंद्रमा के समान प्रतीत हो रहा है। जैसा कि उत्प्रेक्षा अलंकार की परिभाषा में आपको बताया गया है कि जिसमें जानू ,मानू , मानो आदि आए तो वहां पर उत्प्रेक्षा अलंकार होगा। इस उदाहरण में भी मानो का प्रयोग किया गया है। इसलिए यह भी उत्प्रेक्षा अलंकार है।

४. अतिशयोक्ति अलंकार की परिभाषा:– जब किसी बात को बहुत ही बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है तो वहां पर अतिशयोक्ति अलंकार होता है। जब किसी भी बात का वर्णन बढ़– चढ़कर बताया जाए तो वहां अतिशयोक्ति अलंकार ही होगा।

जैसे उदाहरण के लिए:– 

१. धनुष उठाया ज्यों ही उसने, और चढ़ाया उस पर बाण । धरा–सिन्धु नभ काँपे सहसा,विकल हुए जीवों के प्राण।

ऊपर दिए गए उदाहरण में बताया गया है कि जैसे ही अर्जुन ने धनुष उठाया और उस पर बाण चढ़ाया तभी धरती, आसमान तथा नदियां कांपने लगी और ऐसा लग रहा था जैसे कि सभी जीवो के प्राण निकलने वाले हैं।

यह बात बिल्कुल असंभव है, क्योंकि सिर्फ धनुष-बाण उठाने से इतना सब कुछ नहीं हो सकता। अगर वह धनुष-बाण चलाता तो ऐसा हो भी सकता था। इसे  सीमा से बहुत बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया है। इसलिए यह उदाहरण अतिशयोक्ति अलंकार के हैं।

२. आगे नदियाँ पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार।

राणा ने सोचा इस पार , तब तक चेतक था उस पार।

उपयुक्त उदाहरण में चेतक की शक्ति और स्फूर्ति का बहुत  बढ़ा– चढ़ाकर वर्णन किया गया है। अतः यह उदाहरण भी अतिशयोक्ति अलंकार के हैं।

५. मानवीकरण अलंकार की परिभाषा:– जिस अलंकार में प्रकृति की किसी भी चीज की तुलना मनुष्य के साथ की जाए, उसे मानवीकरण अलंकार कहते हैं। जब किसी भी प्राकृतिक चीजों में मनुष्य की भावना प्रकट हो वहां मानवीकरण अलंकार होगा।

जैसे उदाहरण के लिए:– 

१. फूल हँसे कलियाँ मुस्कुराई।

ऊपर दिए गए उदाहरण में आप देख सकते हैं कि फूलों के हंसने का वर्णन किया गया है, जो मनुष्य भी करते हैं। अतः यह मानवीकरण अलंकार है।

२. बीती विभावरी जागरी,

     अंबर पनघट में डुबो रही,

     तारा-घर उषा नागरी।

उपयुक्त उदाहरण में बीती विभावरी की जो रात है वह अब बीत चुकी है, अब तुम जाग जाओ। जिस प्रकार नदी के किनारे खड़े होकर अपने मटके को उसमें डुबाने से पानी भर जाता है ठीक उसी प्रकार अंबर पनघट में डुबो रही है। सूर्य के प्रकाश के आने से तारे सभी छिप गए हैं। तारे होने के बावजूद भी उषा की किरने उसे छिपा देती है।

अतः यह मानवीकरण अलंकार है। इसमें प्रकृति की चीज पानी है, जिसकी तुलना मानव से की गई है।

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