Class 9 Science Chapter – 11 जनन – जीवन की निरंतरता Questions and Answers New Updated NCERT Solutions 

Class 9 Science Chapter – 11 Jann Jeewan ki Nirantarta Questions and Answers New Updated NCERT Solutions 

अभ्यास प्रश्न पेज नंबर: 225 

प्रश्न 1. एक पुष्प के परागकोश को परिपक्व होने से पूर्व ही हटा दिया जाता है। इसके पश्चात उसी प्रजाति के दूसरे पौधे के परागकण उसके वर्तिकाग्र पर छिड़के जाते हैं और बीज बनते हैं। यहाँ कौन सुनिश्चित होती है?

(i) स्व-परागण

(ii) पर-परागण

(iii) निषेचन

(iv) ऊतक संवर्धन

उत्तर (ii) पर-परागण
यह प्रक्रिया तब होती है जब एक पौधे के परागकण दूसरे पौधे के वर्तिकाग्र पर पहुँचते हैं, जिससे निषेचन और बीज निर्माण होता है।

प्रश्न 2. पौधों में लैंगिक जनन के निम्नलिखित चरणों को सही क्रम में व्यवस्थित कीजिए-

(i) वर्तिकाग्र पर पराग का अंकुरण

(ii) निषेचन

(iii) परागण

(iv) युग्मनज का निर्माण

उत्तर: सही क्रम है:-

(iii) परागण → (i) वर्तिकाग्र पर पराग का अंकुरण → (ii) निषेचन → (iv) युग्मनज का निर्माण 

प्रश्न 3. नीचे दिए गए अभिकथन एवं कारण को पढ़िए और उनके संबंध में आगे दिए गए विकल्पों में से सही विकल्प का चयन कीजिए।

अभिकथन निषेचन के पश्चात निर्मित युग्मनज तत्काल गर्भाशय भित्ति से जुड़ जाता है।

कारण- गर्भाशय की भित्ति सदैव युग्मनज को ग्रहण करने के लिए तैयार रहती है।

(i) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं और कारण, अभिकथन की सही व्याख्या है।

(ii) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं किंतु कारण, अभिकथन की सही व्याख्या नहीं है।

(iii) अभिकथन सत्य है, किंतु कारण असत्य है।

(iv) अभिकथन असत्य है, किंतु कारण सत्य है।

उत्तर: (ii) अभिकथन और कारण दोनों सत्य हैं किंतु कारण, अभिकथन की सही व्याख्या नहीं है। 

स्पष्टीकरण:

  • अभिकथन सत्य है: निषेचन के बाद युग्मनज गर्भाशय में प्रवेश करता है और वहाँ इसे ग्रहण किया जाता है, लेकिन यह तुरंत नहीं होता। युग्मनज को गर्भाशय की भित्ति में implant होने के लिए कुछ समय लगता है।
  • कारण भी सत्य है: गर्भाशय की भित्ति वास्तव में युग्मनज को ग्रहण करने के लिए तैयार रहती है, लेकिन यह केवल युग्मनज के गर्भाशय में पहुँचने के बाद की प्रक्रिया है।

इसलिए, जबकि दोनों कथन सत्य हैं, कारण का अभिकथन की प्रक्रिया के साथ सीधा संबंध नहीं है, क्योंकि युग्मनज को गर्भाशय में जुड़ने में समय लगता है।

प्रश्न 4. अलैंगिक जनन से उत्पन्न संततियाँ आनुवंशिक रूप से जनक के समान क्यों होती हैं?

उत्तर: अलैंगिक जनन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक ही जनक (पौधा या जीव) अपने जैसे नए जीवों का उत्पादन करता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत संततियाँ आनुवंशिक रूप से जनक के समान होती हैं, इसके निम्नलिखित कारण हैं:- 

1. एकल जनक: अलैंगिक जनन में केवल एक ही जनक होता है, जो अपने आनुवंशिक गुणों को सीधे संततियों में स्थानांतरित करता है। इससे संततियाँ जनक के समान होती हैं।

2. कोशिका विभाजन: इस प्रक्रिया में, जनक कोशिका विभाजित होती है (जैसे कि समसूत्री विभाजन) और नए जीवों का निर्माण करती है। इस विभाजन के दौरान आनुवंशिक सामग्री (DNA) का कोई मिश्रण नहीं होता, जिससे संततियाँ आनुवंशिक रूप से जनक के समान रहती हैं।

3. क्लोनिंग: अलैंगिक जनन के परिणामस्वरूप उत्पन्न संततियाँ क्लोन कहलाती हैं। ये क्लोन जनक के आनुवंशिक गुणों की सटीक प्रतिकृतियाँ होती हैं, जिससे कोई आनुवंशिक विविधता नहीं होती।

4. पर्यावरणीय स्थिरता: अलैंगिक जनन से उत्पन्न संततियाँ एक ही आनुवंशिक संरचना के कारण पर्यावरण में स्थिरता बनाए रखती हैं। यदि जनक विशेष पर्यावरणीय परिस्थितियों के लिए अनुकूलित है, तो उसकी संततियाँ भी उसी प्रकार अनुकूलित होंगी।

प्रश्न 5. गर्भावस्था के दौरान मासिक धर्म क्यों रुक जाता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: गर्भावस्था के दौरान मासिक धर्म रुकने का मुख्य कारण यह है कि जब अंडाणु निषेचित होता है, तो यह गर्भाशय की दीवार में implant (अंतर्रोपण) होता है। इस प्रक्रिया के दौरान गर्भाशय का आंतरिक अस्तर मोटा और रक्त वाहिकाओं से समृद्ध हो जाता है, ताकि विकसित हो रहे भ्रूण को पोषण मिल सके।

मुख्य बिंदु:- 

1. निषेचन: जब अंडाणु का निषेचन होता है, तो यह गर्भाशय में implant होता है।

2. गर्भाशय का अस्तर: गर्भाशय का आंतरिक अस्तर गर्भावस्था के लिए तैयार होता है और मोटा हो जाता है।

3. मासिक धर्म का रुकना: गर्भावस्था के दौरान, गर्भाशय का यह मोटा अस्तर मासिक धर्म के लिए आवश्यक नहीं होता, इसलिए मासिक धर्म रुक जाता है।

इस प्रकार, गर्भावस्था के दौरान मासिक धर्म रुकने की प्रक्रिया शरीर के हार्मोनल परिवर्तनों से जुड़ी होती है, जो गर्भावस्था को बनाए रखने में सहायक होती है।

प्रश्न 6. दिन के समय खिलने वाले पुष्पों की तुलना में रात में खिलने वाले पुष्प सफेद या हल्के रंग के क्यों होते हैं?

उत्तर: रात में खिलने वाले पुष्पों का सफेद या हल्का रंग होने का मुख्य कारण यह है कि ये पुष्प रात में परागण करने वाले जीवों, जैसे कि चमगादड़ और कुछ रात के कीटों को आकर्षित करने के लिए विकसित हुए हैं। सफेद या हल्के रंग के पुष्प रात में अधिक स्पष्ट होते हैं और इन्हें आसानी से देखा जा सकता है।

– प्रकाश का प्रभाव: सफेद रंग अधिक प्रकाश को परावर्तित करता है, जिससे ये पुष्प रात में भी अधिक दिखाई देते हैं।

– परागण में सहायता: ये रंग रात के समय में परागण करने वाले जीवों को आकर्षित करते हैं, जिससे इन पुष्पों का सफल परागण संभव होता है।

प्रश्न 7. लैंगिक रूप से उत्पन्न पौधों की तुलना में कायिक रूप से प्रवर्धित पौधे रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील क्यों होते हैं?

उत्तर: कायिक रूप से प्रवर्धित पौधे (जैसे कि आलू, अदरक) आनुवंशिक रूप से एक समान होते हैं, क्योंकि ये एक ही जनक से उत्पन्न होते हैं। इस समानता के कारण, यदि कोई रोग या कीट इन पौधों पर हमला करता है, तो सभी पौधे एक समान तरीके से प्रभावित होते हैं।

– आनुवंशिक विविधता की कमी: लैंगिक जनन से उत्पन्न पौधों में आनुवंशिक विविधता होती है, जो उन्हें विभिन्न रोगों और पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति अधिक सहनशील बनाती है।

– रोग प्रतिरोधक क्षमता: कायिक रूप से प्रवर्धित पौधों में रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का अभाव होता है, क्योंकि सभी पौधे एक ही आनुवंशिक जानकारी साझा करते हैं।

इसलिए, यदि एक पौधा किसी रोग से प्रभावित होता है, तो अन्य पौधे भी उसी रोग का शिकार हो सकते हैं, जिससे उनकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है।

प्रश्न 8. यदि किसी प्रकार के पौधे में सभी पुष्प केवल स्व-परागण करने में सक्षम हों तो आगे आने वाली अनेक पीढ़ियों में आनुवंशिक विविधता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: यदि किसी प्रकार के पौधे में सभी पुष्प केवल स्व-परागण (self-pollination) करने में सक्षम हों, तो इसके परिणामस्वरूप आनुवंशिक विविधता पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ेंगे:-

  1. कम आनुवंशिक विविधता:
    • स्व-परागण के कारण, पौधे की संतति आनुवंशिक रूप से अपने जनक के समान होगी। इसका मतलब है कि संतति में कोई नया आनुवंशिक संयोजन नहीं बनेगा।
    • इससे पौधों की आनुवंशिक विविधता में कमी आएगी, क्योंकि सभी पौधे एक ही आनुवंशिक सामग्री से उत्पन्न होंगे।
  2. संवेदनशीलता:
    • आनुवंशिक विविधता की कमी के कारण, पौधे विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों, रोगों और कीटों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाएंगे।
    • यदि कोई रोग या कीट विशेष रूप से उन पौधों को प्रभावित करता है, तो सभी पौधे प्रभावित होंगे, जिससे उनकी प्रजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
  3. विकास की गति में कमी:
    • आनुवंशिक विविधता का अभाव विकास की गति को धीमा कर सकता है, क्योंकि नए लक्षण या अनुकूलन उत्पन्न नहीं होंगे।
    • इससे पौधों की प्रजातियाँ समय के साथ विकसित नहीं हो पाएंगी और वे परिवर्तित पर्यावरण में जीवित रहने में असमर्थ हो सकती हैं।
  4. स्थिरता में कमी:
    • आनुवंशिक विविधता पौधों को विभिन्न परिस्थितियों में अनुकूलित होने में मदद करती है। स्व-परागण से उत्पन्न पौधे एक समान होंगे, जिससे उनकी स्थिरता में कमी आएगी।
    • पर्यावरणीय परिवर्तन के प्रति उनकी प्रतिक्रिया सीमित होगी, जिससे उनकी उत्तरजीविता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

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प्रश्न 9. एक कृषक बड़ी संख्या में आनुवंशिक रूप से एक जैसे पौधे शीघ्रता से उगाना चाहता है। इसके लिए उपयुक्त जनन विधियों का सुझाव दीजिए और समझाइए कि वे प्रभावी क्यों हैं?

उत्तर: किसान यदि आनुवंशिक रूप से एक जैसे पौधे शीघ्रता से उगाना चाहता है, तो उसे अलैंगिक जनन की विधियों का उपयोग करना चाहिए। यहाँ कुछ उपयुक्त विधियाँ दी गई हैं: 

1. काटने (Cutting):

  • इस विधि में पौधे की एक शाखा या तने का टुकड़ा लिया जाता है और इसे मिट्टी में रोपित किया जाता है। यह टुकड़ा जड़ें विकसित करके एक नए पौधे में परिवर्तित हो जाता है।
  • प्रभावशीलता: यह विधि त्वरित होती है और नए पौधे आनुवंशिक रूप से जनक पौधे के समान होते हैं।

2. कलम बाँधना (Grafting):

  • इस प्रक्रिया में एक पौधे की टहनी (कलम) को दूसरे पौधे के तने पर जोड़ा जाता है। दोनों भागों का मिलन एक नए पौधे का निर्माण करता है।
  • प्रभावशीलता: यह विधि विशेष रूप से फलों के पौधों में उपयोगी होती है, जिससे उच्च गुणवत्ता वाले फल प्राप्त होते हैं।

3. परतन (Layering):

  • इस विधि में पौधे की एक टहनी को मिट्टी में दबा दिया जाता है ताकि वह जड़ें विकसित कर सके। जब यह जड़ें विकसित कर लेती हैं, तो इसे जनक पौधे से काटकर अलग किया जाता है।
  • प्रभावशीलता: यह विधि सरल है और नए पौधे आनुवंशिक रूप से समान होते हैं।

4. ऊतक संवर्धन (Tissue Culture):

  • इस विधि में पौधे की कोशिकाओं को नियंत्रित वातावरण में विकसित किया जाता है। इससे एक ही पौधे से हजारों पौधे उत्पन्न किए जा सकते हैं।
  • प्रभावशीलता: यह विधि उच्च गुणवत्ता वाले और रोग-मुक्त पौधों का उत्पादन करती है।

प्रश्न 10. सुरेश परागकणों के अंकुरण का अध्ययन करने के लिए विभिन्न शर्करा सांद्रता (0%, 2.5%, 5%, 7.5%, 10%) में परागकण लेकर स्लाइड तैयार करता है।

(i) इस व्यवस्थापन के उपयोग से किन विभिन्न परिकल्पनाओं की जाँच की जा सकती है?

उत्तर: सुरेश द्वारा विभिन्न शर्करा सांद्रता (0%, 2.5%, 5%, 7.5%, 10%) में परागकणों के अंकुरण का अध्ययन करने के लिए निम्नलिखित परिकल्पनाएँ की जा सकती हैं:

(i) परिकल्पनाएँ:-

1. शर्करा सांद्रता का प्रभाव: यह परिकल्पना की जा सकती है कि शर्करा की सांद्रता परागकणों के अंकुरण की दर को प्रभावित करेगी। उच्च शर्करा सांद्रता परागकणों के विकास को प्रोत्साहित कर सकती है।

2. अंकुरण की अधिकतम दर: यह भी परिकल्पना की जा सकती है कि एक विशेष सांद्रता परागकणों के अंकुरण के लिए सबसे अनुकूल होगी।

(ii) इस व्यवस्थापन में कौन-से मानदंडों को समान रखा जाना चाहिए?

उत्तर: समान रखे जाने वाले मानदंड: 

1. परागकणों की मात्रा: सभी प्रयोगों में समान मात्रा में परागकणों का उपयोग किया जाना चाहिए।

2. तापमान: प्रयोग के दौरान तापमान को स्थिर रखना चाहिए ताकि परिणामों में भिन्नता न आए।

3. समय: सभी शर्करा सांद्रता के लिए अंकुरण का समय समान होना चाहिए।

4. पानी की मात्रा: सभी स्लाइड में समान मात्रा में पानी या शर्करा समाधान होना चाहिए।

इस प्रकार, सुरेश का अध्ययन परागकणों के अंकुरण पर शर्करा सांद्रता के प्रभाव को स्पष्ट करने में मदद करेगा और यह समझने में सहायक होगा कि किस सांद्रता परागकणों के विकास के लिए सबसे उपयुक्त है।

प्रश्न 11. नीचे दिए गए चित्र को देखिए और दिए गए संकेतों के आधार पर पता लगाइए कि इन पुष्पों में किस प्रकार का परागण हुआ होगा-

उत्तर: 1. टमाटर: स्व-परागण (Self-pollination): टमाटर के पुष्पों में पुंकेसर वर््ततिकाग्र को ढक लेते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि परागण उसी पुष्प के भीतर होता है। जब पुष्प परागण के प्‍चचात खुलते हैं, तो यह स्व-परागण की पुष्टि करता है।

2. गेहूँ: पर-परागण (Cross-pollination): गेहूँ के पुष्प परागण के प्‍चचात खुलते हैं, जो यह दर्शाता है कि परागण बाहरी स्रोतों (जैसे हवा) द्वारा होता है।

3. पपीता: पर-परागण (Cross-pollination): पपीता के नर और मादा पुष्प अलग-अलग पेड़ों पर होते हैं, इसलिए यह पर-परागण की प्रक्रिया को दर्शाता है। नर पुष्प का पराग मादा पुष्प तक पहुँचता है, जिससे निषेचन होता है।

प्रश्न 12. उत्तरी भारत के निचले हिमालयी क्षेत्र में सेब एक महत्त्वपूर्ण नकदी फसल है जो कृषकों की आजीविका में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक परागणकरियों की जनसंख्या में अत्यधिक गिरावट के कारण सेब की उपज निरंतर घट रही है। 

एक शोधकर्ता कृषक समूह ने दो अलग-अलग स्थानों स्थान, ‘क’ और स्थान ‘ख’ पर परिक्षणार्थ सेब के दो उद्यान लगाए। स्थान ‘क’ के उद्यानों में इन्होंने सेब के पुष्पों का परागण प्राकृतिक परागणकारियों द्वारा होने दिया। स्थान ‘ख’ के उद्यानों में इन्होंने मधुमक्खी पालन की मिश्रित कृषि तकनीक अपनाई। 

सेब के उत्पादन के साथ-साथ कृषक ने शहद का भी उत्पादन किया। सेबों की उपज को चित्र 11.24 में दर्शाया गया है। इसे फल लगने (फलधारी शाखाओं की कुल संख्या के सापेक्ष फलों की संख्या) तथा फल गिरने (विकसित हो रहे फलों का समयपूर्व गिर जाना) के आधार पर सेब के उद्यानों के दो प्रकार के प्रायोगिक स्थलों के संदर्भ में दर्शाया गया है। 

(i) शोधकर्ता-कृषक समूह ने इस शोध कार्य के लिए किन परिकल्पनाओं पर विचार किया होगा?

उत्तर: 1. प्राकृतिक परागण बनाम कृत्रिम परागण: शोधकर्ता ने यह परिकल्पना की होगी कि मधुमक्खियों द्वारा किया गया कृत्रिम परागण प्राकृतिक परागण की तुलना में अधिक प्रभावी होगा, जिससे फल लगने की दर में वृद्धि होगी।

2. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: यह भी एक परिकल्पना हो सकती है कि जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक परागणकारियों की संख्या में कमी आई है, जिससे सेब की उपज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

3. फल गिरने की दर: शोधकर्ता ने यह भी विचार किया होगा कि मधुमक्खी पालन से फल गिरने की दर में कमी आएगी, क्योंकि अधिक परागण से फल अधिक स्थिर रहेंगे।

(ii) प्रयोग में कौन-कौन से विभिन्न मानदंड हैं?

उत्तर: स्थान: दो अलग-अलग स्थानों (स्थान ‘क’ और स्थान ‘ख’) का चयन किया गया है। 

1. परागण विधि: स्थान ‘क’ में प्राकृतिक परागण और स्थान ‘ख’ में मधुमक्खी पालन का उपयोग किया गया है।

2. फल लगने की दर: फल लगने की संख्या को फलधारी शाखाओं की कुल संख्या के सापेक्ष मापा गया है।

3. फल गिरने की दर: विकसित हो रहे फलों का समयपूर्व गिरना मापा गया है।

4. जलवायु की स्थिति: दोनों स्थानों की जलवायु की स्थिति को समान रखने का प्रयास किया गया होगा।

(iii) सेब की अधिक उपज के संदर्भ में परिक्षणार्थ लगाए गए दो उद्यानों ‘क’ और ‘ख’ के आँकड़ों की तुलना और विश्लेषण कीजिए।

उत्तर: स्थान ‘क’ (प्राकृतिक परागण): 

1. फल लगने की दर: कम

2. फल गिरने की दर: अधिक

स्थान ‘ख’ (मधुमक्खी पालन): 

1. फल लगने की दर: अधिक

2. फल गिरने की दर: कम

विश्लेषण:

  • स्थान ‘ख’ में मधुमक्खियों द्वारा परागण करने से फल लगने की दर में वृद्धि हुई है, जबकि स्थान ‘क’ में प्राकृतिक परागण के कारण फल लगने की दर कम रही।
  • फल गिरने की दर भी स्थान ‘ख’ में कम रही, जो यह दर्शाता है कि मधुमक्खियों का परागण अधिक स्थिरता प्रदान करता है।

(iv) अपने विश्लेषण के आधार पर इन आँकड़ों से आपने क्या निष्कर्ष निकाला?

उत्तर: कृत्रिम परागण की प्रभावशीलता: मधुमक्खी पालन द्वारा किया गया परागण प्राकृतिक परागण की तुलना में अधिक प्रभावी है, जिससे सेब की उपज में वृद्धि होती है।

  • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव: जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक परागणकारियों की संख्या में कमी आई है, जिससे सेब की उपज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
  • सामाजिक और आर्थिक लाभ: मधुमक्खी पालन न केवल सेब की उपज को बढ़ाता है, बल्कि शहद का उत्पादन भी करता है, जिससे कृषकों की आय में वृद्धि होती है।

इस प्रकार, यह अध्ययन यह दर्शाता है कि मधुमक्खी पालन जैसी तकनीकें कृषि में सुधार और कृषकों की आजीविका में योगदान कर सकती हैं।

प्रश्न 13. एक विद्यार्थी का दावा है कि ‘मानवों में अंडोत्सर्ग सदैव मासिक धर्म के 14वें दिन होता है।’ कथन की विवेचनात्मक रूप से जाँच कीजिए और बताइए कि दावा सही है या नहीं। अपने उत्तर के लिए कम-से-कम दो कारण दीजिए।

उत्तर: एक विद्यार्थी का दावा है कि ‘मानवों में अंडोत्सर्ग सदैव मासिक धर्म के 14वें दिन होता है।’ इस कथन की विवेचनात्मक रूप से जाँच करने पर निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है:–

1. मासिक धर्म चक्र की विविधता:- 

मासिक धर्म चक्र की लंबाई: सामान्यतः मानवों में मासिक धर्म चक्र की लंबाई 21 से 35 दिनों के बीच होती है। चक्र की लंबाई हर महिला में भिन्न हो सकती है। इसलिए, यह कहना कि अंडोत्सर्ग हमेशा 14वें दिन होता है, सही नहीं है। यदि किसी महिला का चक्र 28 दिनों का है, तो अंडोत्सर्ग लगभग 14वें दिन होगा, लेकिन यदि चक्र 21 या 35 दिनों का है, तो अंडोत्सर्ग का दिन भिन्न होगा।

2. हार्मोनल प्रभाव:-

हार्मोनल परिवर्तन: अंडोत्सर्ग का समय हार्मोनल स्तर पर निर्भर करता है। ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH) का स्तर अंडोत्सर्ग के समय में वृद्धि करता है, लेकिन यह हर महिला में भिन्न हो सकता है। इसलिए, अंडोत्सर्ग का समय केवल 14वें दिन होना आवश्यक नहीं है।

निष्कर्ष:-

इसलिए, विद्यार्थी का दावा सही नहीं है। अंडोत्सर्ग का समय हर महिला के मासिक धर्म चक्र की लंबाई और हार्मोनल स्तर पर निर्भर करता है, और यह हमेशा 14वें दिन नहीं होता।

कारण:-

  1. मासिक धर्म चक्र की लंबाई में भिन्नता।
  2. हार्मोनल स्तर का प्रभाव।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि अंडोत्सर्ग का समय व्यक्तिगत भिन्नताओं के आधार पर बदल सकता है।

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