NCERT Solutions for Class 10 Social Science Loktantrik Rajniti Jaati Dharm aur Laingik Masale Questions and Answers
प्रश्न 1. जीवन के उन विभिन्न पहलुओं का जिक्र करें जिनमें भारत में महिलाओं के साथ भेदभाव होता है या वो कमजोर स्थिति में होती है?
उत्तर: भारत में महिलाओं के साथ भेदभाव के विभिन्न पहलू :
भारत में महिलाओं के साथ भेदभाव कई क्षेत्रों में देखा जा सकता है। निम्नलिखित पहलुओं में यह भेदभाव स्पष्ट रूप से प्रकट होता है:
- शिक्षा:
- महिलाओं की साक्षरता दर पुरुषों की तुलना में कम है। उदाहरण के लिए, महिलाओं में साक्षरता की दर 54% है जबकि पुरुषों में यह 76% है।
- उच्च शिक्षा के अवसरों में भी महिलाओं की संख्या सीमित है, जिससे उनके करियर के विकास में बाधा आती है।
- रोज़गार:
- महिलाओं को आमतौर पर पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है, भले ही वे समान कार्य कर रही हों।
- घरेलू कामकाज को अक्सर अव्यवसायिक माना जाता है, जिससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है।
- स्वास्थ्य:
- महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
- मातृत्व स्वास्थ्य और प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की कमी भी महिलाओं के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व:
- भारत की विधायिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। लोकसभा में महिलाओं की संख्या 14.36% और राज्य विधानसभाओं में 5% से भी कम है।
- महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था अभी भी पूरी तरह से लागू नहीं है, जिससे उनकी राजनीतिक भागीदारी सीमित है।
- सामाजिक और सांस्कृतिक भेदभाव:
- पारिवारिक और सामाजिक संरचनाओं में महिलाओं को अक्सर घरेलू कार्यों तक सीमित रखा जाता है, जिससे उन्हें सार्वजनिक जीवन में भागीदारी करने का अवसर नहीं मिलता।
- कई समुदायों में महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है, जिससे उनकी आवाज़ दब जाती है।
- लिंग आधारित हिंसा:
- घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और अन्य प्रकार की हिंसा महिलाओं के लिए आम समस्याएँ हैं। शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में महिलाएँ इन समस्याओं का सामना करती हैं।
- महिलाओं के प्रति भेदभाव और हिंसा की घटनाएँ समाज में गहरी जड़ें जमा चुकी हैं।
इन सभी पहलुओं से स्पष्ट होता है कि भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार की आवश्यकता है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों में समानता सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
प्रश्न 2. विभिन्न तरह की सांप्रदायिक राजनीति का ब्यौरा दे और सब के साथ एक-एक उदारहण भी दें?
उत्तर: विभिन्न प्रकार की सांप्रदायिक राजनीति और उदाहरण:
सांप्रदायिक राजनीति का तात्पर्य उस राजनीति से है जो धार्मिक समुदायों के आधार पर विभाजन, पहचान और हितों को प्राथमिकता देती है। यह राजनीति कई रूपों में प्रकट होती है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
- धार्मिक पहचान आधारित राजनीति:
- उदाहरण: भारत में कई राजनीतिक दल, जैसे कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), अपने चुनावी अभियानों में हिंदू पहचान को प्रमुखता देते हैं। वे हिंदू संस्कृति और परंपराओं को बढ़ावा देने के लिए नीतियाँ बनाते हैं, जिससे हिंदू मतदाताओं का समर्थन प्राप्त किया जा सके।
- सांप्रदायिक गोलबंदी:
- उदाहरण: चुनावों के दौरान, विभिन्न राजनीतिक दल अक्सर एक विशेष धार्मिक समुदाय के मतदाताओं को गोलबंद करने के लिए धार्मिक प्रतीकों और भावनाओं का उपयोग करते हैं। जैसे, मुस्लिम समुदाय के लिए कुछ दल विशेष रूप से मुस्लिम उम्मीदवारों को खड़ा करते हैं ताकि वे मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन प्राप्त कर सकें।
- धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा:
- उदाहरण: कुछ राजनीतिक दल धार्मिक अल्पसंख्यकों, जैसे कि मुसलमानों और ईसाइयों, के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष नीतियाँ बनाते हैं। उदाहरण के लिए, कांग्रेस पार्टी ने अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की है, जो अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करता है।
- सांप्रदायिक दंगों का राजनीतिक लाभ उठाना:
- उदाहरण: कुछ राजनीतिक दल सांप्रदायिक दंगों के दौरान उत्पन्न स्थिति का लाभ उठाते हैं। जैसे, 2002 के गुजरात दंगों के बाद, कुछ दलों ने दंगों को अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया, जिससे वे अपने समुदाय के लोगों के बीच लोकप्रियता हासिल कर सके।
- धार्मिक कानूनों में बदलाव की मांग:
- उदाहरण: महिला आंदोलन के तहत, विभिन्न नारीवादी समूहों ने पारिवारिक कानूनों में बदलाव की मांग की है, जो कि धर्म के आधार पर भेदभाव करते हैं। जैसे, मुस्लिम व्यक्तिगत कानून में सुधार की मांग की जाती है ताकि महिलाओं को समान अधिकार मिल सकें।
सांप्रदायिक राजनीति का प्रभाव समाज में गहरा होता है, और यह अक्सर सामाजिक तनाव और विभाजन का कारण बनता है। इसके बावजूद, यह कुछ समुदायों के लिए अपने अधिकारों और हितों की रक्षा का एक माध्यम भी बन सकता है। इस प्रकार, सांप्रदायिक राजनीति को समझना और इसके प्रभावों का विश्लेषण करना आवश्यक है।
प्रश्न 3. बताइए की भारत में किस तरह अभी भी जातिगत असमानताएँ जारी हैं।
उत्तर: भारत में जातिगत असमानताएँ:
भारत में जातिगत असमानताएँ एक जटिल सामाजिक समस्या हैं, जो सदियों से चली आ रही हैं। आज भी, ये असमानताएँ विभिन्न रूपों में प्रकट होती हैं। यहाँ कुछ प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख किया गया है:
- शिक्षा में असमानता:
- अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बच्चों की साक्षरता दर अन्य जातियों की तुलना में कम है। उदाहरण के लिए, अनुसूचित जातियों में साक्षरता की दर 54% है, जबकि अन्य जातियों में यह दर 76% है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा के क्षेत्र में जातिगत भेदभाव अभी भी विद्यमान है।
- आर्थिक असमानता:
- जाति के आधार पर आर्थिक स्थिति में भी भिन्नता देखी जाती है। उच्च जातियों के लोग आमतौर पर बेहतर आर्थिक स्थिति में होते हैं, जबकि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोग अधिकतर गरीबी में जीवन यापन करते हैं। उदाहरण के लिए, अनुसूचित जातियों में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या अधिक है।
- रोजगार में भेदभाव:
- जातिगत असमानताओं के कारण, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों को उच्च पदों पर पहुँचने में कठिनाई होती है। उन्हें अक्सर निम्न श्रेणी के कामों में ही सीमित रखा जाता है, जबकि उच्च जातियों के लोग बेहतर रोजगार के अवसरों का लाभ उठाते हैं।
- सामाजिक भेदभाव:
- जाति के आधार पर विवाह और सामाजिक संबंधों में भेदभाव आज भी प्रचलित है। लोग अपनी जाति के भीतर ही विवाह करना पसंद करते हैं, जिससे जातिगत विभाजन और भी मजबूत होता है।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व:
- राजनीतिक क्षेत्र में भी जातिगत असमानताएँ देखी जाती हैं। अनुसूचित जातियों और जनजातियों का प्रतिनिधित्व संसद में बहुत कम है। जबकि कुछ राजनीतिक दल इन जातियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं, वास्तविकता में उनकी आवाज़ अक्सर दबाई जाती है।
- छुआछूत की प्रथा:
- संविधान द्वारा छुआछूत को अवैध घोषित किए जाने के बावजूद, कई क्षेत्रों में यह प्रथा अभी भी जारी है। अनुसूचित जातियों के लोग अक्सर सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में शामिल नहीं होने दिए जाते हैं।
इन सभी बिंदुओं से स्पष्ट होता है कि भारत में जातिगत असमानताएँ अभी भी एक गंभीर समस्या हैं, जिन्हें समाप्त करने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।
प्रश्न 4. दो कारण बताए कि क्यों सिर्फ जाति के आधार पर भारत में चुनाव के परिणाम तय नहीं हो सकते?
उत्तर: भारत में चुनाव परिणामों पर जाति के आधार पर निर्भरता के कारण:
भारत में चुनाव परिणाम केवल जाति के आधार पर तय नहीं हो सकते, इसके पीछे कई कारण हैं। यहाँ दो प्रमुख कारणों का उल्लेख किया गया है:
- विविध राजनीतिक प्राथमिकताएँ:
- भारत के चुनावी क्षेत्रों में कोई एक जाति बहुमत में नहीं होती, जिससे किसी एक जाति के मतदाताओं का समर्थन प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं होता। विभिन्न जातियों के मतदाता अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुसार विभिन्न पार्टियों को समर्थन देते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि चुनावी नतीजे केवल जाति के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों की नीतियों, उम्मीदवारों की छवि और स्थानीय मुद्दों पर भी निर्भर करते हैं।
- आर्थिक और सामाजिक कारक:
- मतदाता केवल जाति के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति, सामाजिक पृष्ठभूमि और व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर भी मतदान करते हैं। उदाहरण के लिए, एक ही जाति के भीतर अमीर और गरीब मतदाताओं के हित अलग-अलग हो सकते हैं, जिससे वे विभिन्न राजनीतिक दलों को वोट देने का निर्णय लेते हैं। इस प्रकार, जाति के अलावा अन्य कारक भी चुनाव परिणामों को प्रभावित करते हैं।
इन कारणों से यह स्पष्ट होता है कि भारत में चुनाव परिणाम केवल जाति के आधार पर तय नहीं होते, बल्कि यह एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारक शामिल होते हैं।
प्रश्न 5. भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति क्या है?
उत्तर: भारत की विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति
भारत की विधायिकाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो समाज में लैंगिक समानता की दिशा में प्रगति को दर्शाता है। यहाँ इस संदर्भ में कुछ प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख किया गया है:
- कम प्रतिनिधित्व:
- भारत की संसद (लोकसभा) में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। 2019 में, महिला सांसदों की संख्या केवल 14.36% थी। राज्य विधानसभाओं में यह आंकड़ा और भी कम है, जहाँ महिलाओं का प्रतिनिधित्व 5% से भी नीचे है।
- महिला आरक्षण विधेयक:
- महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए, महिला आरक्षण विधेयक (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पेश किया गया है। इस अधिनियम के तहत, लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% सीटों का आरक्षण सुनिश्चित किया गया है। यह विधेयक 2023 में पारित हुआ, जो महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व:
- पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं। इस व्यवस्था के तहत, ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिलाओं की संख्या 10 लाख से अधिक है। यह स्थानीय स्तर पर महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुआ है।
- सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियाँ:
- महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के बावजूद, उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें सामाजिक पूर्वाग्रह, राजनीतिक दलों में पुरुषों का वर्चस्व और महिलाओं के प्रति भेदभाव शामिल हैं।
- महिलाओं की राजनीतिक जागरूकता:
- महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वृद्धि के लिए जागरूकता और शिक्षा का स्तर भी महत्वपूर्ण है। महिलाओं को राजनीतिक प्रक्रियाओं और उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना आवश्यक है, ताकि वे सक्रिय रूप से राजनीति में भाग ले सकें।
इन बिंदुओं से स्पष्ट होता है कि भारत की विधायिकाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी सीमित है, लेकिन हाल के वर्षों में इसे बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं। महिलाओं के लिए आरक्षण और स्थानीय निकायों में उनकी भागीदारी इस दिशा में सकारात्मक कदम हैं।
प्रश्न 6. किन्हीं दो प्रावधानों का जिक्र करें जो भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाते हैं?
उत्तर: भारत को धर्मनिरपेक्ष देश बनाने वाले प्रावधान:
भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित है, जो सभी धर्मों के प्रति समानता और निष्पक्षता सुनिश्चित करता है। यहाँ दो प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख किया गया है:
- धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध:
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 के तहत, राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान या किसी अन्य आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर प्राप्त हों, चाहे वे किसी भी धर्म का पालन करते हों।
- धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार:
- अनुच्छेद 25 के अनुसार, सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने, उसका प्रचार करने और उसे बदलने का अधिकार है। यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने धार्मिक विश्वासों का पालन करने की स्वतंत्रता हो, जिससे विभिन्न धर्मों के बीच सहिष्णुता और सम्मान को बढ़ावा मिलता है।
इन प्रावधानों के माध्यम से भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में स्थापित होता है, जहाँ सभी धर्मों को समान महत्व दिया जाता है और किसी भी धर्म के अनुयायियों के साथ भेदभाव नहीं किया जाता।
प्रश्न 7. जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय होता है:
(क) स्त्री और पुरुष के बीच जैविक अंतर
(ख) समाज द्वारा स्त्री और पुरुष को दी गई असमान भूमिकाएँ
(ग) बालक और बालिकाओं की संख्या का अनुपात
(घ) लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में महिलाओं को मतदान का अधिकार न मिलना ।
उत्तर: लैंगिक विभाजन की परिभाषा:
जब हम लैंगिक विभाजन की बात करते हैं, तो हमारा अभिप्राय मुख्यतः (ख) समाज द्वारा स्त्री और पुरुष को दी गई असमान भूमिकाएँ से होता है।
यह विभाजन इस बात को दर्शाता है कि कैसे समाज ने स्त्रियों और पुरुषों के लिए विभिन्न भूमिकाएँ और जिम्मेदारियाँ निर्धारित की हैं, जो अक्सर असमान होती हैं। यह सामाजिक निर्माण जैविक अंतर (जैसे कि स्त्री और पुरुष के बीच शारीरिक अंतर) से अलग है और यह दर्शाता है कि लैंगिक असमानता का आधार सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ हैं।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- (क) स्त्री और पुरुष के बीच जैविक अंतर: यह जैविक भिन्नता को दर्शाता है, लेकिन लैंगिक विभाजन का मुख्य कारण नहीं है।
- (ग) बालक और बालिकाओं की संख्या का अनुपात: यह जनसंख्या संबंधी आंकड़ा है, लेकिन लैंगिक विभाजन का मूल नहीं है।
- (घ) लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में महिलाओं को मतदान का अधिकार न मिलना: यह एक विशेष मुद्दा है, लेकिन यह भी लैंगिक विभाजन की व्यापक परिभाषा का हिस्सा नहीं है।
इस प्रकार, सही उत्तर (ख) है।
प्रश्न 8. भारत में यहाँ औरतों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है:
(क) लोकसभा
(ख) विधानसभा
(ग) मंत्रिमंडल
(घ) पंचायतीराज संस्थाएँ ।
उत्तर: भारत में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था
भारत में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था निम्नलिखित क्षेत्रों में लागू है:
- (घ) पंचायतीराज संस्थाएँ: भारत में पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं। यह व्यवस्था ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने के लिए बनाई गई है।
इसके अलावा, लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान भी प्रस्तावित किया गया है, लेकिन यह अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं हुआ है।
इसलिए, सही उत्तर है (घ) पंचायतीराज संस्थाएँ।
प्रश्न 9. सांप्रदायिक राजनीति के अर्थ संबंधी निम्नलिखित कथनों पर विचार करें। सांप्रदायिक राजनीति इस धारणा पर आधारित है कि:
(क) एक धर्म दूसरों से बेहतर है
(ख) विभिन्न धर्मों के लोग समान नागरिक के रूप में खुशी खुशी साथ रह सकते हैं
(ग) एक धर्म के अनुयायी एक समुदाय बनाते हैं
(घ) एक धार्मिक समूह का प्रभुत्व बाकी सभी धर्मों पर कायम करने में शासन की शक्ति का उपयोग नहीं किया जा सकता है
कौन सा कथन सही है / हैं?
(क) क, ख, ग और घ
(ख) क, ख और घ
(ग) क और ग
(घ) ख और घ
उत्तर:
प्रश्न 10. भारतीय संविधान के बारे में निम्नलिखित में से कौन सा कथन गलत है?
(क) धर्म के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है।
(ख) यह एक धर्म को राजकीय धर्म बताता है।
(ग) सभी व्यक्तियों को कोई भी धर्म को स्वीकार करने की आजादी देता है।
(घ) किसी धार्मिक समुदाय में सभी नागरिकों को बराबरी का अधिकार देता है।
उत्तर:
प्रश्न 11. ___________ पर आधारित सामाजिक विभाजन सिर्फ भारत में ही है।
उत्तर:
प्रश्न 12. सूची I और सूची II का मिलान करें और नीचे दिए गए कोड के आधार पर सही उत्तर चुनें:
| सूची I | सूची II |
| 1. समान अधिकारों और अवसरों के मामले में महिला और पुरुष की बराबरी मानने वाला व्यक्ति | क. साम्प्रदायिक |
| 2. धर्म को समुदाय का प्रमुख आधार मानने वाला व्यक्ति | ख. नारीवादी |
| 3. जाति को समुदाय का प्रमुख आधार मानने वाला व्यक्ति | ग. धर्मंनिरपेक्ष |
| 4. व्यक्तियो के बीच धार्मिक मान्यताओं के आधार पर दूसरों के साथ भेदभाव नहीं करने वाला व्यक्ति | घ. जातिवादी |
| 1 | 2 | 3 | 4 | |
| क | ख | ग | क | घ |
| ख | ख | क | घ | ग |
| ग | घ | ग | क | g |
| घ | ग | क | ख | घ |
उत्तर:
| 1 | 2 | 3 | 4 | |
| ख | ख | क | घ | ग |
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